सनातन धर्म में नवरात्रि का पर्व वर्ष में चार बार आता है—दो प्रत्यक्ष (चैत्र एवं शारदीय नवरात्रि) और दो अप्रत्यक्ष (माघ एवं आषाढ़ गुप्त नवरात्रि)। यह समय ब्रह्मांड में पराशक्ति भगवती जगदंबा की दिव्य ऊर्जा के प्रकटीकरण का होता है।
घटस्थापना (कलश स्थापना) के शास्त्रीय नियम
कलश को ब्रह्मांड और सभी देवी-देवताओं का प्रतीक माना जाता है। घटस्थापना सदैव शुभ मुहूर्त और प्रतिपदा तिथि के दौरान ही करनी चाहिए:
- ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में स्वच्छ स्थान पर पवित्र मिट्टी या वेदी बनाकर उसमें सप्तधान्य (जौ) बोएं।
- तांबे या मिट्टी के कलश पर स्वास्तिक चिन्ह बनाएं, उसमें शुद्ध जल, गंगाजल, दूर्वा, सुपारी, अक्षत और एक सिक्का डालें।
- कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते रखकर नारियल को लाल वस्त्र में लपेटकर प्रतिष्ठित करें।
नवरात्रि में साधना व जप के नियम
पूज्य महर्षि आलोक आनंद जी के अनुसार नवरात्रि काल में साधक को निम्नलिखित नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए:
- सात्विक जीवनशैली: पूर्ण ब्रह्मचर्य, फलाहार अथवा एक समय सात्विक भोजन और तामसिक विचारों से दूरी।
- अखंड ज्योति: यदि संभव हो तो नौ दिनों तक अखंड दीपक प्रज्वलित रखें। यह घर के समस्त वास्तु दोष और अज्ञात नकारात्मक स्पंदनों को भस्म कर देता है।
- दुर्गा सप्तशती पाठ: नियमित रूप से कवच, कीलक, अर्गला स्तोत्र और तेरह अध्यायों का पाठ अथवा सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का जप करें।
- नवार्ण मंत्र जप: "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" मंत्र का प्रतिदिन न्यूनतम 5 माला जप करने से अंतःकरण में असीम शक्ति का संचार होता है।
आश्रम में नवरात्रि महायज्ञ
प्रत्येक नवरात्रि में माँ गुरु आश्रम, डुमरिया घाट में पूज्य गुरुदेव के सानिध्य में 9 दिवसीय विशेष चंडी पाठ, शतचंडी अनुष्ठान एवं कन्या पूजन का दिव्य आयोजन होता है।