सामान्य जनमानस में 'तंत्र' शब्द सुनते ही अक्सर भय, अंधकार, कपटी तांत्रिकों या चमत्कारों की काल्पनिक छवियाँ उभरने लगती हैं। परंतु भारतीय आगम और निगम परंपरा में तंत्र का स्थान अत्यंत आदरणीय और वैज्ञानिक रहा है।
तंत्र का वास्तविक अर्थ क्या है?
तंत्र शब्द दो शब्दों के योग से बना है—'तनोति' (विस्तार करना) और 'त्रायते' (रक्षा करना या मुक्त करना)। अर्थात वह ज्ञान जो मनुष्य की संकुचित चेतना का विस्तार कर उसे प्रकृति और परमात्मा के विराट स्वरूप से जोड़ दे और समस्त भयों व बंधनों से रक्षा करे, वही सच्चा तंत्र है।
सात्विक और सुरक्षित साधना मार्ग
शास्त्रों में साधना की तीन प्रमुख धाराएं बताई गई हैं—सात्विक, राजसिक और तामसिक। सात्विक तंत्र पूर्णतः भगवती आदिशक्ति, भगवान शिव, महाकाल एवं श्रीविद्या की विशुद्ध आराधना है। इसमें किसी भी प्रकार की पशुबलि, मदिरा या घृणित वस्तुओं का कोई स्थान नहीं होता।
- भय व मोह का नाश: तंत्र साधना का पहला उद्देश्य साधक के अंतःकरण से मृत्यु, समाज और भविष्य के भय को समाप्त करना है।
- ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन: मूलाधार में स्थित सुषुप्त शक्ति को प्राणायाम और जप द्वारा सहस्रार तक ले जाना।
- रक्षा कवच का निर्माण: बीज मंत्रों की ध्वनि तरंगों द्वारा स्वयं के चारों ओर एक सुरक्षात्मक ऊर्जा क्षेत्र निर्मित करना।
गुरु परंपरा का महत्व
पूज्य महर्षि आलोक आनंद जी का दृढ़ संदेश है कि तंत्र साधना बिना सिद्ध गुरु के संरक्षण में कभी नहीं करनी चाहिए। माँ गुरु आश्रम, डुमरिया घाट में साधकों को केवल सात्विक, सुरक्षित एवं वैदिक विधि से ही ध्यान व मंत्र जप का अभ्यास कराया जाता है।