तप • त्याग • साधना • सेवा • गुरु-परंपरा
33 से अधिक वर्षों के अनवरत साधना काल में पूज्य महर्षि आलोक आनंद जी ने भारत के प्राचीन वैदिक ज्ञान, तंत्र-मंत्र विज्ञान, ज्योतिष, हस्तरेखा और ध्यान की गहराइयों को आत्मसात कर समाज के कल्याण हेतु समर्पित किया है।
जन्म एवं प्रारंभिक आध्यात्मिक आकर्षण
महर्षि आलोक आनंद जी का जन्म बिहार के पावन एवं ऐतिहासिक जनपद पूर्वी चंपारण (मोतिहारी) की पुण्यभूमि पर हुआ। बचपन से ही वे सांसारिक प्रपंचों की तुलना में एकांत चिंतन, ईश्वर आराधना और आध्यात्मिक जिज्ञासाओं में लीन रहते थे। अपने जन्मस्थान से प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा ग्रहण करने के उपरांत उन्होंने वर्ष 1993 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की।
कठोर साधना, तीर्थाटन एवं अघोर दीक्षा
युवा अवस्था में पहुँचते ही आत्मज्ञान और ईश्वरीय साक्षात्कार की तीव्र उत्कंठा ने उन्हें गृहस्थ जीवन के बंधनों से विरक्त कर दिया। उन्होंने अघोर पंथ में विधिवत दीक्षा ग्रहण की। इसके पश्चात उन्होंने भारत के दुर्गम पर्वतों, घने जंगलों, प्रसिद्ध सिद्धपीठों एवं श्मशानों में वर्षों तक कठोर तपस्या की। वे कामरूप कामाख्या, असम, विंध्याचल, काशी और हिमालय की गुफाओं में तपस्यारत रहे।
4 जनवरी 1998: आध्यात्मिक साक्षात्कार का स्वर्णिम दिवस
4 जनवरी 1998 को बिहार की राजधानी पटना के पवित्र गुलबी घाट श्मशान में माँ गंगा के तट पर उन्हें अपने इष्टदेव के प्रत्यक्ष दर्शन एवं साक्षात्कार का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह उनके जीवन का एक युगांतरकारी मोड़ था, जहाँ से उनकी अंतश्चेतना दिव्य प्रकाश से आलोकित हुई और उन्हें जनकल्याण का दैवीय आदेश प्राप्त हुआ।
असम के वनों में एकांत तपस्या एवं विद्या समन्वय
गुलबी घाट के साक्षात्कार के उपरांत उन्होंने असम के वनों में दीर्घकाल तक मौन एवं एकांत साधना की। वर्ष 2007 में गहन आध्यात्मिक अनुभूतियों के उपरांत उन्होंने अपने गुरुदेव के आदेशानुसार समाज में ज्ञान के प्रचार हेतु अपनी औपचारिक शिक्षा भी आगे बढ़ाई।
उन्होंने इतिहास विषय में स्नातकोत्तर (M.A.) की उपाधि प्राप्त की तथा विधि (LL.B.) की परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की। प्राचीन सनातन अध्यात्म और आधुनिक विधि व इतिहास के इस दुर्लभ संगम ने उनके दृष्टिकोण को अत्यंत तार्किक, संतुलित और प्रामाणिक बना दिया।
माँ गुरु आश्रम की स्थापना एवं सेवा प्रकल्प
समाज के पीड़ित, भ्रमित और उपेक्षित लोगों को सही आध्यात्मिक संबल देने हेतु महर्षि जी ने गंडक नदी के पावन तट पर माँ गुरु आश्रम, डुमरिया घाट (गोपालगंज, बिहार) की स्थापना की। इसके अतिरिक्त गोरखपुर (उत्तर प्रदेश), काशी (वाराणसी) एवं असम में भी सेवा केंद्र और साधना पीठ स्थापित किए गए।
मानसिक स्वास्थ्य व शांति
मिर्गी, अवसाद (Depression), अनिद्रा, सायकोफ्रेनिया एवं माइग्रेन से ग्रसित लोगों को ध्यान, प्राणायाम व सात्विक मंत्र चिकित्सा से संबल प्रदान करना।
पारिवारिक व दांपत्य सद्भाव
पति-पत्नी विवाद, गृहक्लेश, पारिवारिक विघटन और संपत्ति विवादों में निष्पक्ष एवं आध्यात्मिक समाधान द्वारा घरों को टूटने से बचाना।
पूज्य गुरुदेव का प्रेरक संदेश
"मेरे गुरुदेव ने मुझे सिखाया था कि जब भी तुम किसी के माथे पर हाथ रखो, तो उसे केवल आशीर्वाद ही मत दो, उसे गुरु बनने का संकल्प भी दो।"
"गुरु बनो, प्रकाश बनो, और अपने ज्ञान, प्रेम तथा सेवा से समाज को प्रकाशित करो। यही सच्ची साधना है।"