भगवान महाकाल काल के भी काल हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड समय (काल) के अधीन है, परंतु भगवान शिव उस काल के भी अधिपति हैं। उज्जैन के अधिपति और 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रधान श्री महाकालेश्वर की तंत्रोक्त साधना से साधक के जीवन से मृत्यु और अनिष्ट का भय समूल नष्ट हो जाता है।
महाकाल साधना का उद्देश्य
महाकाल साधना का मुख्य उद्देश्य केवल भौतिक संकटों से रक्षा नहीं, बल्कि हमारे अंतःकरण के अज्ञान, भ्रम और काल चक्र के बंधनों को तोड़कर आत्मा को उसकी अमरता का साक्षात्कार कराना है:
- अकाल मृत्यु व दुर्घटना से रक्षा: जो भक्त नित्य महाकाल के शरणागत रहता है, उस पर अकाल मृत्यु की छाया भी नहीं पड़ती।
- घोर नकारात्मकता का शमन: किसी भी प्रकार का तांत्रिक अभिचार, ईर्ष्या, दृष्टि दोष या अज्ञात भय महाकाल की भस्म धारा के समक्ष ठहर नहीं पाता।
- आंतरिक आत्मबल: साधक को ऐसी मानसिक सुदृढ़ता प्राप्त होती है कि वह जीवन की किसी भी विपत्ति में विचलित नहीं होता।
साधना के सात्विक नियम
पूज्य महर्षि आलोक आनंद जी सदैव यह स्मरण कराते हैं कि महाकाल साधना अत्यंत उग्र ऊर्जा का क्षेत्र है। अतः इसे तामसिक क्रियाओं से बचाकर पूर्ण सात्विक, संयमित एवं गुरु आदेश के अंतर्गत ही संपन्न किया जाना चाहिए:
- नित्य रुद्राक्ष माला से "ॐ जूं सः माम् पालय पालय सः जूं ॐ" अथवा महामृत्युंजय मंत्र का जप करें।
- भगवान महाकाल को भस्म (विभूति), भांग, धतूरा और जल अत्यंत प्रिय हैं। सात्विक भाव से इनकी मानसिक या प्रत्यक्ष पूजा करें।
- क्रोध, अहंकार और असत्य भाषण का त्याग कर दीन-दुखियों की सेवा का संकल्प लें।
आश्रम में महाकाल रक्षा विधान
यदि आप या आपके परिवार पर किसी असाध्य रोग, ऊपरी बाधा या निरंतर अनहोनी का साया हो, तो माँ गुरु आश्रम, डुमरिया घाट में पूज्य गुरुदेव से महाकाल रक्षा कवच व संकल्पित जप का मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं।