वैदिक ज्योतिष के अनुसार हमारी जन्म कुण्डली में जब कोई ग्रह प्रतिकूल भाव में बैठता है, नीच अवस्था में होता है या क्रूर ग्रहों से दृष्ट होता है, तो वह जीवन में बाधाएं और कष्ट उत्पन्न करने लगता है। इसे ही 'ग्रह दोष' कहा जाता है।
प्रमुख ग्रहों के दोष एवं उनके लक्षण
- सूर्य दोष: पिता से मतभेद, सरकारी कार्यों में बाधा, अपयश, नेत्र विकार एवं हृदय रोग।
- चंद्र दोष: मानसिक अस्थिरता, अनिद्रा, डिप्रेशन, माता का अस्वस्थ रहना एवं भय।
- मंगल दोष: रक्त विकार, क्रोध, भूमि विवाद, चोट-दुर्घटना एवं वैवाहिक कलह।
- शनि दोष: कार्यों में अत्यधिक विलंब, साढ़ेसाती व ढैय्या की पीड़ा, जोड़ों का दर्द एवं निरंतर असफलता।
- राहु-केतु दोष: अचानक आर्थिक नुकसान, भ्रमित रहना, अज्ञात भय, ऊपरी बाधाओं का आभास एवं कालसर्प योग।
प्रामाणिक एवं सरल सात्विक उपाय
पूज्य महर्षि आलोक आनंद जी का मानना है कि ईश्वरीय शरणागति और शास्त्रों में वर्णित सात्विक आचरण से ग्रहों के अशुभ प्रभाव को निष्प्रभावी किया जा सकता है:
- सूर्य देव: प्रतिदिन तांबे के पात्र से सूर्योदय के समय अर्घ्य दें और "ॐ घृणि सूर्याय नमः" का 108 बार जप करें।
- चंद्रमा: सोमवार को भगवान शिव का कच्चा दूध व जल से अभिषेक करें तथा पूर्णिमा को ध्यान करें।
- शनि देव: शनिवार की शाम पीपल वृक्ष के नीचे सरसों तेल का चौमुखी दीपक जलाएं और निर्धन लोगों को भोजन कराएं।
- राहु-केतु: शिव मंदिर में जाकर महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। बुधवार या शनिवार को काले तिल व कंबल का दान करें।
व्यक्तिगत ग्रह शांति अनुष्ठान
यदि आप कई वर्षों से किसी ग्रह की महादशा या अंतर्दशा के कारण संकटग्रस्त हैं, तो माँ गुरु आश्रम, डुमरिया घाट में कुण्डली दिखाकर संकल्पित वैदिक मंत्र जप व शांति विधान करा सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
बिल्कुल नहीं। वैदिक ज्योतिष में रत्न केवल एक माध्यम हैं। मंत्र जप, सात्विक दान, शिव उपासना एवं सेवा भाव द्वारा किसी भी ग्रह दोष का उससे अधिक शक्तिशाली और स्थायी शमन किया जा सकता है।
साढ़ेसाती के दौरान अनैतिक कर्मों, झूठ, दूसरों का अहित करने से बचें। शनिवार को पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों तेल का दीपक जलाएं और असहाय लोगों की सेवा करें।